आज के दौर में ए दोस्त यह मंज़र क्यों है
ज़ख्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यों है
सबको मालुम है दुनिया कि हकीकत लेकिन,
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यों है...
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Ramblings from the PAST
Tuesday, July 3, 2007
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1 comment:
doosra sher bahut achchha hai
sachha bhi hai
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