ज़िंदगी मैं तुझसे हर इक मोड़ पे समझौता करूं
शौक जीने का है मुझको, मगर इतना भी नहीं
यह जो जिंदगी की किताब है, ये किताब भी क्या किताब है,
कहीं एक हसीं सा ख्वाब है, कहीं जानलेवा अजाब है
कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी, कहीं मेहरबान बेहिस्साब है
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Ramblings from the PAST
Monday, November 26, 2007
Saturday, July 7, 2007
अशोक चक्रधर
भूख में होती है कितनी लाचारी
यह दिखाने के लिए एक भिखारी
लॉन की घास खाने लगा ।
घर के मालकिन में दया जगाने लगा।
दया सचमुच में जागी,
मालकिन आयी भागी भागी
क्या करते हो भैया
भिखारी बोला, भूख लगी है मैया
अपने आपको मरने से बचा रहा हूँ
इसलिये घास ही खा रहा हूँ।
तो मालकिन ने अपनी आवाज़ में
मिसरी सी घोली
और ममता मयी आवाज़ में बोली,
कि कुछ भी हो भैया
यह घास मत खाओ
मेरे साथ अन्दर आओ।
तो दम्दमाता ड्राइंग रूम
चमचमाती lobby
एशोआरम के सभी ठाठ नवाजी।
फलों से लड़ी हुई खाने कि मेज़
और kitchen से आयी खाने कि खुशबु बड़ी तेज़
तो भूख बजाने लेगी पेट में नगाड़े।
लेकिन मालकिन ले आयी भिखारी को पिछवाड़े
भिखारी भोचाक्का सा देखता रहा।
और मालकिन ने प्यार से कहा
नर्म है, मुलायम है, कच्ची है
इसे खाओ भैया, बहार के घास से यह खास अच्छी है।
यह दिखाने के लिए एक भिखारी
लॉन की घास खाने लगा ।
घर के मालकिन में दया जगाने लगा।
दया सचमुच में जागी,
मालकिन आयी भागी भागी
क्या करते हो भैया
भिखारी बोला, भूख लगी है मैया
अपने आपको मरने से बचा रहा हूँ
इसलिये घास ही खा रहा हूँ।
तो मालकिन ने अपनी आवाज़ में
मिसरी सी घोली
और ममता मयी आवाज़ में बोली,
कि कुछ भी हो भैया
यह घास मत खाओ
मेरे साथ अन्दर आओ।
तो दम्दमाता ड्राइंग रूम
चमचमाती lobby
एशोआरम के सभी ठाठ नवाजी।
फलों से लड़ी हुई खाने कि मेज़
और kitchen से आयी खाने कि खुशबु बड़ी तेज़
तो भूख बजाने लेगी पेट में नगाड़े।
लेकिन मालकिन ले आयी भिखारी को पिछवाड़े
भिखारी भोचाक्का सा देखता रहा।
और मालकिन ने प्यार से कहा
नर्म है, मुलायम है, कच्ची है
इसे खाओ भैया, बहार के घास से यह खास अच्छी है।
Tuesday, July 3, 2007
Mazarnama
आज के दौर में ए दोस्त यह मंज़र क्यों है
ज़ख्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यों है
सबको मालुम है दुनिया कि हकीकत लेकिन,
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यों है...
ज़ख्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यों है
सबको मालुम है दुनिया कि हकीकत लेकिन,
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यों है...
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