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Ramblings from the PAST

Monday, November 26, 2007

ज़िंदगी मैं तुझसे हर इक मोड़ पे समझौता करूं
शौक जीने का है मुझको, मगर इतना भी नहीं

यह जो जिंदगी की किताब है, ये किताब भी क्या किताब है,
कहीं एक हसीं सा ख्वाब है, कहीं जानलेवा अजाब है
कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी, कहीं मेहरबान बेहिस्साब है